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क्रिकेटरों के डीएनए टेस्ट की जांच शुरू, सुरेश रैना की बैटिंग और भुवनेश्वर मे बदलाव

नई दिल्ली. फिटनेस के लिए भारतीय क्रिकेट टीम यो-यो टेस्ट तो दे रही थी, अब डीएनए परीक्षण भी करवा रही है। परीक्षण खिलाड़ियों की पहचान के लिए नहीं बल्कि शरीर के दमखम के आधार पर प्रदर्शन सुधारने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए, इसकी पहचान के लिए है।

बीसीसीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने गोपनीयता की शर्त पर कहा, ‘हां,
खुद बीसीसीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने गोपनीयता की शर्त पर कहा, ‘हां, हमने भारतीय क्रिकेट टीम के लिए कुछ समय पहले डीएनए परीक्षण शुरू किया है। यह फिटनेस के नए मापदंडों के अनुसार किया जा रहा है। मापदंड टीम प्रबंधन ने तय किए हैं।’

परीक्षण का यह सुझाव बीसीसीआई के टीम ट्रेनर शंकर बासु ने दिया था ताकि टीम के लिए और बेहतर फिटनेस कार्यक्रम तैयार हो सके। बताया जा रहा है कि यह काफी लाभकारी साबित हुआ है।

सीनियर खिलाड़ियों के शरीर में फैट का मानक
25-30 हजार रुपये तक  एक खिलाड़ी पर टेस्ट का खर्च होता है, 23% सीनियर खिलाड़ियों के शरीर में फैट का मानक होता है, पाकिस्तान और न्यूजीलैंड सहित अधिकतर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट टीमें भी इसे ही मानक मानती हैं।

सूत्रों के अनुसार, डीएनए परीक्षण के बाद तेज गेंदबाज भुवनेश्वर कुमार की परफॉर्मेंस में काफी सुधार आया है। चैंपियन्स ट्रोफी शुरू होने के बाद भुवनेश्वर ने 19 वनडे और 7 टी20 इंटरनैशनल मैच खेले और यह उनकी आनुवंशिक फिटनेस रिपोर्ट तैयार करने के बाद नए फिटनेस रूटीन के बाद ही संभव हो पाया।

टेस्ट बताता है कि इस परीक्षण से फायदा
डीएनए परीक्षण से 40 साल से ज्यादा उम्र के व्यक्ति की फिटनेस, स्वास्थ्य और पोषण से जुड़ी जानकारी के बारे में पता चलता है। इसके बाद पूरे विश्लेषण के लिए हर क्रिकेटर के डीएनए प्रोफाइल के हिसाब से तय किया जाता है कि उनका वजन कितना होना चाहिए। खान-पान में कौन से बदलाव जरूरी हैं, यह इसके अगले चरण में तय होता है।

 खिलाड़ी की आनुवंशिक फिटनेस स्थिति स्पष्ट हो जाती है। उसकी क्षमता, ताकत का सही अंदाजा मिलता है। खिलाड़ी को अपनी रफ्तार बढ़़ाने, मोटापा कम करने, दमखम बढ़ाने, मांसपेशियों को मजबूत बनाने में मदद मिलती है।

पहले होते थे स्किनफोल्ड, डेस्का टेस्ट
परीक्षण अमेरिका में सबसे पहले एनबीए (बास्केटबाल) व एनएफएल में शुरू किया गया था।  अब तक भारतीय टीम शरीर में वसा के प्रतिशत का पता करने के लिये स्किनफोल्ड टेस्ट और बाद में डेक्सा टेस्ट करवाती थी।

स्किनफोल्ड टेस्ट मुख्य रूप से लंबे समय के लिये उपयोग किया गया था, लेकिन इसमें पाया गया कि वसा की मात्रा को लेकर परिणाम सटीक नहीं हैं। इसके बाद डेक्सा टेस्ट अपनाया गया। अब डीएनए परीक्षण किया जा रहा है।

खिलाड़ी बचपन से ही खूब दूध पीते रहे, वे लैक्टोज को नहीं पचा पाते हैं, जो दूध में होता है
अधिकारी के अनुसार, कुछ खिलाड़ी बचपन से ही खूब दूध पीते रहे हैं क्योंकि आम धारणा है कि इससे शरीर को मजबूती मिलती है। परीक्षण के बाद पता चला कि कड़े अभ्यास के बाद भी उनका शरीर वर्तमान में खेल की जरूरतों के हिसाब से नहीं है। कुछ को पता चला कि वे लैक्टोज को नहीं पचा पाते हैं, जो दूध में होता है। जो खिलाड़ी मटन-बिरयानी खाने के शौकीन हैं, उन्हें पता चला कि किसी खास तरह के खाने के बाद उनके शरीर को क्या मिलना चाहिए।