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एक सवाल ने 25 दिन में खड़ा करवा दिया एक लाख का कारोबार

लखनऊ. ऐसा कम ही होता है जब कोई सवाल ही नई राह खोल दे। लेकिन अलीगंज के राजकीय फल संरक्षण केन्द्र पर चल रहे एक प्रशिक्षण कार्यक्रम में ऐसा ही हुआ। यहां अचार-जैम-मुरब्बा बनाने के लिए चल रहे प्रशिक्षण के दौरान एक प्रशिक्षु ने पूछा कि इसके बाद बिजनेस शुरू करने के लिए रकम और बुनियादी सुविधाएं कहां से लाएंगे/ इसका जवाब राजकीय फल संरक्षण केन्द्र के प्रभारी डॉ. संजीव कुमार सिंह चौहान ने खोजा। उन्होंने प्रशिक्षण में शामिल 30 लोगों से पूछा कि क्या वे अपना बिजनेस शुरू करना चाहते हैं। 15 लोगों ने आगे आकर कहा कि वे इसके लिए कड़ी मेहनत करने को तैयार हैं। संजीव ने इन लोगों को 500-500 रुपये जुटाने को कहा। 7500 रुपये इकट्ठे कर इस टीम ने अचार-जैम-मुरब्बा बनाना शुरू कर दिया। अगले 25 दिन में इन लोगों ने एक लाख रुपये की पूंजी जुटा ली। टीम अब अपनी कंपनी बनाने जा रही है।

कृषि विज्ञान से बीएससी, हॉर्टीकल्चर से एमएससी कर चुके दिवाकर टीम लीडर हैं। राजाजीपुरम की रमेश मिश्रा 12वीं पास हैं, मार्केटिंग की जिम्मेदारी देख रहे हैं। जानकीपुरम की संगीता हाउस वाइफ हैं, वे यहां प्रोडक्शन इंचार्ज हैं। एमटेक कर चुकीं सना फातिमा अकाउंट संभालती हैं। निष्ठा शुक्ला, नफीस फातिमा, बीना सामान बनाने व बॉटलिंग करती हैं।
काम करने की जगह दी। अच्छी गुणवत्ता व बाजार से 30 प्रतिशत तक कम दाम के उत्पादों को ग्राहकों से अच्छा रेस्पॉन्स मिला तो उत्पादन बढ़ गया। जब पर्याप्त पूंजी जुट गई तो टीम ने केन्द्र के पास ही एक कमरे में काम शुरू कर दिया है।

इस टीम के लीडर दिवाकर वर्मा ने बताया कि वे एक प्राइवेट कंपनी के जरिए अपने उत्पाद बाजार में बेच रहे हैं। यह कम्पनी उत्पादों की गुणवत्ता की जांच करती है। इसके बाद अपने नाम से बाजार में बेचती है।

सबसे पहले जैम बनाने के लिए 25 किलो सेब, चीनी व अन्य सामान लिया। एक दिन में जैम तैयार हुआ। दूसरे दिन 500-500 ग्राम के 42 जार तैयार किए। एक जार पर 45 रुपये लागत आई। थोक में इन्हें 80 रुपये प्रति जार के हिसाब से बेचा गया। ज्यादातर खरीदार परिचित थे।

तीसरे दिन 25 किलो सेब से खट्टी-मीठी चटनी तैयार की। इसके 500-500 ग्राम 42 जार तैयार हुए। एक जार पर 55 रुपये की लागत आई। चौथे दिन प्रति जार 100 रुपये के हिसाब से इन्हें थोक में बेचा गया। समूह के अनुसार, सबसे ज्यादा सेब का जैम व चटनी ही बनाकर बेची गई।

फिर सेब का मुरब्बा बनाया। मुरब्बा चार-पांच दिन में तैयार हो जाता है। एक किलो मुरब्बे पर 58 रुपये खर्च हुए। थोक में 110 से 130 रुपये/ किलो में बिका। अब तक बिजनेस को शुरू हुए 10 दिन हो गए थे। 

टीम ने अगले चार-पांच दिन बाजार में सर्वे किया। ताजा सामान हाथोंहाथ मिलने की संभावना दिखी तो कंपनियों ने भी प्रोत्साहित किया। अगले दस दिन में टीम ने जैम, मुरब्बे और चटनी, अचार, केचप बनाया गया। ज्यादातर सामान हाथोंहाथ बिका और पेमेंट भी मिल गया। इस तरह से इस समूह ने 25 दिन में एक लाख रुपये के करीब पूंजी जुटा ली।