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इतिहास पर बहसः वास्कोडिगामा को कान्हा लाए थे भारत, RSS ने किया खुलासा

 
नई दिल्ली। इतिहास से छेड़छाड़ को लेकर एक और मुद्दा उठा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े संगठन भारतीय शिक्षण मंडल ने दावा किया है कि वास्कोडिगामा ने दुनिया को भारत आने का रास्ता नहीं बताया, बल्कि गुजरात के एक व्यापारी कान्हा भाई के सहारे वास्कोडिगामा भारत आया था।
भारतीय शिक्षण मंडल के अखिल भारतीय संगठन मंत्री मुकुल कानितकर के अनुसार, वास्कोडिगामा ने अपनी डायरी में लिखा है कि गुजरात के व्यापारी उसे भारत लेकर आए। उन्होंने कहा कि वास्कोडिगामा बेईमान नहीं थे, बल्कि इस डायरी का जिक्र किए बिना हमें गलत इतिहास पढ़ाने वाले बेईमान हैं।

कान्हा भाई लाए भारत-इग्नू और भारतीय शिक्षण मंडल की ओर से
भारतीय शिक्षण मंडल के नेता कानितकर ने ‘भारत की खोज‘ की नई व्याख्या करते हुए कहा कि- वास्कोडिगामा ने तो यह भी लिखा है कि उस कान्हा भाई के जहाज मेरे जहाजों से कई गुना अधिक विकसित थे। चालीस खेवे लगाने के बाद भी मेरे जहाज को उतनी रफ्तार नहीं मिलती थी, जितनी रफ्तार से कान्हा भाई के जहाज चलते थे। कान्हा भाई का जहाज तीन मंजिला था, जिसके ऊपर डेक था। उस जहाज को केवल 16 नाविक खेते थे। कानितकर ने कहा कि अंग्रेज जब इस देश में आए तो विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में भारत बाकी दुनिया से कहीं आगे था। ऐसा अंग्रेजों में से ही कुछ ईमानदार इतिहासकारों ने लिखा है। सबसे विकसित था हमारा विज्ञान|

08 जुलाई 1497 में पुर्तगाल से भारत की तलाश में वास्कोडिगामा निकला था, वो 20 मई 1498 को वास्कोडीगामा कालीकट तट पहुंचा। 20 साल बाद फिर भारत आए और यहीं मई 1524 में उनका निधन हो गया।
भारत बोध कार्यक्रम में आरएसस के कानितकर ने बताई सच्चाई,
आयोजित ‘भारत बोध’ व्याख्यान श्रृंखला में ‘भारतीय संस्कृति का वैश्विक अवदान’ विषय पर अपने लेक्चर में संघ प्रचारक कानितकर ने इस बात का मजाक उड़ाया कि वास्कोडिगामा ने भारत को खोजा। उन्होंने कहा कि हमारे व्यापारी सारी दुनिया में जाते थे। वास्कोडिगामा ने अपनी डायरी में लिखा है कि गुजरात के एक व्यापारी अपने पानी के एक जहाजों के साथ उसे दक्षिण अफ्रीका में मिले।
कानिटकर ने हंसते हुए कहा, ‘उसको तो भारत मिला नहीं था। गुजरात के व्यापारी कान्हा भाई ने उससे कहा, अच्छा भारत खोज रहे हो! चलो मैं ले चलता हूं। वास्कोडिगामा को मसाले भरने थे, इसलिए कान्हा भाई उसे कालिकट ले गए, वरना गुजरात के भरूच ले आते। तब हमारे इतिहासकार लिखते कि वास्कोडिगामा भारत को खोजते-खोजते भरूच पहुंचा।
राष्ट्रीय स्तर पर किसी किताब में ऐसा कोई उल्लेख नहीं है कि वास्कोडिगामा को कोई गुजराती भारत लाया। गुजरात के स्थानीय आर्काइव में ऐसा हो तो, नहीं कहा जा सकता।