Home उत्तर-प्रदेश नेशनलाइजेशन यानी बैंकों का राष्ट्रीयकरण

नेशनलाइजेशन यानी बैंकों का राष्ट्रीयकरण

नई दिल्ली. देश के अब तक के सबसे बड़े कर सुधार की लॉन्चिंग का ऐतिहासिक मौका शुक्रवार आधी रात को आ गया। रात ठीक 12 बजते ही राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक साथ बटन दबाकर पूरे देश में एक टैक्स व्यवस्था की शुरुआत की। इस लॉन्चिंग के साथ ही भारत जीएसटी लागू करने वाला 161वां देश बन गया। हालांकि, इस मुकाम तक पहुंचने में हमें 17 साल लगे। इस पल का गवाह बना संसद का सेंट्रल हॉल। वही हॉल जिसने 70 साल पहले आजाद भारत को अपना पहला कदम बढ़ाते हुए देखा था। इसी कक्ष में इसी तरह आधी रात को पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने आजादी का पहला भाषण दिया था। इसी जगह 14वें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टैक्सों के जाल से आजादी का भाषण दिया। राष्ट्रपति ने इसे देशभर के तमाम राज्यों की सरकारों के बीच सहमति और देशहित के लिए सबके साथ आने का प्रतीक बताया। वहीं, प्रधानमंत्री ने इसे देश के सभी लोगों की साझी विरासत कहा। प्रोग्राम में एक हजार से ज्यादा वीआईपी शामिल हुए.

– शनिवार सुबह से ही 1 देश, 1 टैक्स और 1 बाजार यानी जीएसटी अमल में आ गया।
– इस ऐतिहासिक समारोह में जहां एक हजार से ज्यादा वीआईपी शामिल हुए। वहीं कांग्रेस, ममता और लालू की पार्टी दूर रही।
– आजादी के बाद ये पहली बार है, जब संसद के किसी बड़े समारोह से कांग्रेस दूर रही। टाटा पहुंचे, लेकिन अमिताभ-लता नजर नहीं आए।
48 साल में 4 बड़े इकोनॉमिक रिफॉर्म्स, इनमें से 3 जुलाई में ही हुए
– जुलाई यानी बदलाव का प्रतीक। देश के तीन बड़े ऐतिहासिक आर्थिक सुधार इसी महीने में हुए। जीएसटी भी जुलाई में ही लागू हुआ है। कर सुधार की दिशा में यह भी ऐतिहासिक कदम है।
– 1969 से 2017 यानी 48 साल में हुए चारों बड़े आर्थिक सुधारों के उद्देश्य और असर पर एक नजर- जिन्होंने हमारी जिंदगी को किसी न किसी तरह बदला है…
1. नेशनलाइजेशन यानी बैंकों का राष्ट्रीयकरण; हर तबका जुड़ा, बढ़कर 57 हजार हो गईं बैंक ब्रांच
19 जुलाई 1969 को किया गया।
मकसद: तब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 14 प्राइवेट बैंकों का नेशनलाइजेशन किया था। इसका मकसद बैंकिंग सर्विस में विस्तार के साथ गांव और कस्बों में रह रहे लोगों को बैंकिंग सिस्टम से जोड़ना था। लोन लेकर लोग कारोबार शुरू कर सकें और बेरोजगारी दूर हो। ग्रामीण इलाकों की स्थिति में सुधार व एग्रीकल्चर और स्मॉल इंडस्ट्री को बढ़ावा देना था। बीमार उद्योगों को फिर से खड़ा करना भी इसका महत्वपूर्ण उद्देश्य था।
असर: पहले बैंकिंग चंद बड़े लोगों तक सीमित थी। इसके बाद समाज के हर तबके के लोग इसका हिस्सा बने। करीब 28 साल में 800% बढ़ोत्तरी हुई। बैंकों की शाखाअों की संख्या 7,219 से बढ़कर 57 हजार पहुंच गई। जमा राशि और एडवांस में 11,000% और 9000% की बढ़ोत्तरी हुई।
2. लिबरलाइजेशन यानी आर्थिक उदारीकरण; भारत उभरती महाशक्ति बना, मंदी को बेअसर किया
24 जुलाई 1991 को लागू किया।
मकसद: तब फाइनेंस मिनिस्टर मनमोहन सिंह ने बजट में इकोनॉमी को प्राइवेट सेक्टर के लिए पूरी तरह खोलने का फैसला किया। इसका मकसद आर्थिक गति को रफ्तार देना था। रोजगार को बढ़ावा देना था। साथ ही, भारतीय बाजार को पूरी दुनिया के लिए खोलना था। बढ़ती महंगाई को नियंत्रित करना भी इसी का हिस्सा था। साथ ही, कर सुधार के साथ विदेशी निवेश को लेकर लचीला सिस्टम तैयार करना था।
असर: तब जीडीपी की सालाना वृद्धि दर 2-3% थी, जो 2005-06 से 2007-08 के बीच 9% पर पहुंच गई। भारत आर्थिक महाशक्ति बनने लगा। 1991 के समय विदेशी मुद्रा भंडार खाली था। पर बाद में फॉरेन करंसी और एक्सपोर्ट बढ़ा। 2008 की वैश्विक मंदी को भी इसने बेअसर किया।
3. डिमॉनेटाइजेशन यानी नोटबंदी; डिजिटल ट्रांजैक्शन 42% बढ़े, कालेधन, फेक करंसी, टेरर फंडिंग में कमी
8 नवंबर 2016 को लागू हुई।
मकसद:नरेंद्र मोदी ने 500 और 1000 की नोटों को बंद कर दिया था। इसका मकसद डिजिटल ट्रांजैक्शन को बढ़ावा देना यानी नकदी रहित अर्थव्यवस्था खड़ी करना था। साथ ही, मार्केट से फेक करंसी को बाहर करना, कालाधन वापस लाना और भ्रष्टाचार पर रोक लगाना भी इसका उद्देश्य था। टेरर फंडिंग रुकने की भी उम्मीद की गई थी। नोटबंदी के बाद देश में डिजिटल ट्रांजैक्शन 42% तक बढ़ गए।
असर: सरकार का दावा है टेरर फंडिंग कम हुई। आतंकी हमले कम हुए। नकली नोटों का चलन रुका। इसके नेगेटिव असर से जीडीपी ग्रोथ कम हुई। 2016-17 की चौथी तिमाही में जनवरी-मार्च के बीच भी पिछले फाइनेंशियल ईयर के मुकाबले विकास दर गिरकर 6.1% पर आ गई।
4.वन टैक्स-वन नेशन यानी जीएसटी; समान टैक्स, आसान व्यापार और टैक्स भरने के लिए लोगों को प्रोत्साहन
1 जुलाई 2017 से लागू।
मकसद: जीएसटी लागू होने के बाद सभी राज्यों में एक समान कर लगेगा। इससे राज्यों के बीच होने वाला अनहेल्दी कॉम्पिटीशन रुकेगा। जीएसटी का मकसद माल (गुड्स) और सेवाओं (सर्विस) के प्रोडक्शन और डिस्ट्रीब्यूशन लागत पर करों के दोहरे असर को खत्म करना है। टैक्स पर टैक्स के व्यापक प्रभावों को खत्म कर उसे एक टैक्स में बदलने से बाजार में वस्तुओं और सेवाओं के कॉम्पिटीशन में काफी सुधार होगा, जिससे जीडीपी में बढ़ोत्तरी होगी।
असर: परेशानी कम होगी और कारोबारी टैक्स देने के लिए आगे आएंगे। सामान पर टैक्स समान होगा तो महंगाई और कालाबाजारी पर रोक लगेगी। टैक्स ढांचा मजबूत होगा। मल्टीपल टैक्स फाइलिंग खत्म होगी और टैक्स अदा करने के लिए कई जगह दस्तावेज नहीं भरने होंगे।
5 प्वाइंट में समझिए जीएसटी में क्या बदला
पहले जीएसटी
17 टैक्स, 23 सेस, टैक्स पर टैक्स 1 जीएसटी, टैक्स पर टैक्स खत्म
हर टैक्स का अलग रिटर्न बस एक टैक्स का रिटर्न
हर टैक्स का अलग विभाग सिर्फ एक टैक्स का विभाग
हर राज्य में अलग टैक्स रेट पूरे देश में एक टैक्स रेट
राज्यों के 1,150 चुंगी बैरियर सभी बैरियर खत्म
EU से ढाई गुना बड़ा 1 टैक्स वाला बाजार बना भारत
– जीएसटी लागू होने के साथ ही पूरा भारत एक मार्केट बन गया है। इसका साइज यूरोपियन यूनियन (ईयू) से ढाई गुना ज्यादा है। ईयू की आबादी 50.8 करोड़ है, जबकि हमारी 131 करोड़ है। ईयू में 28 देश शामिल हैं। लेकिन हमारे यहां कुल 36 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश हैं।
– दुनिया की 90% आबादी अब जीएसटी के दायरे में आ गई है। भारत जीएसटी लागू करने वाला 161वां देश है। सबसे पहले फ्रांस ने 1954 में यह टैक्स सिस्टम अपनाया था।
– भारत ने जीएसटी का ड्यूल मॉडल अपनाया है। कनाडा के बाद यह मॉडल अपनाने वाला भारत दूसरा देश है।
इसलिए चुना सेंट्रल हॉल: मोदी
– दिसंबर 1946: जब इसी सेंट्रल हॉल में संविधान सभा की पहली बैठक हुई।
– अगस्त 1947: जब रात 12.00 बजे देश की आजादी की घोषणा हुई।
– 26 नवंबर 1949: इसी सेंट्रल हॉल में देश के संविधान को स्वीकार किया गया था। और इसी जगह आज सबसे बड़ा टैक्स सुधार का एलान। इसलिए इससे पवित्र जगह कोई और नहीं हो सकती थी।
 रोजमर्रा की जिंदगी आज से कितनी सस्ती और महंगी होगी
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